एक ‘सुंदर-मन’ वाकई प्रकृति की हजार रचनाओं पर भारी है; और तभी तो सुकरात से लेकर कबीर तक सबका इतना महत्व है।



One ‘beautiful-mind’ indeed weighs heavy over thousand creations of nature and that is why from Socrates to Kabir, all hold such great importance.

जीवन के कैसे भी शौक या किसी भी शारीरिक कर्म में कोई बुराई नहीं, यदि सलीके से किये गए हों तो। वैसे ही मंदिर जाने या पूजा करने में भी कोई अच्छाई नहीं। मनुष्य की अच्छाई करुणा, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता व निर्दोषता जैसे गुणों में छिपी हुई है। जबकि सामने स्वार्थ, ईर्ष्या, पक्षपात व जिद्द जैसे अवगुण ही उसकी बुराई है।



There is nothing wrong in having any kind of fancy in life or any physical act, if done appropriately. Likewise, there is no virtue in visiting temples or worshipping either. The goodness of being human lies in the qualities like compassion, self-confidence, self-dependence and innocence which are tainted by attributes like jealousy, partiality, selfishness and stubbornness.

प्रकृति में कोई भी मनुष्य परफेक्ट नहीं होता है। हर व्यक्ति का अपना एक स्वभाव और अपना एक क्षेत्र होता है। हम जिन्हें भगवान कहते हैं वे भी जीवनभर विज्ञान के ज्ञान से अनजान ही थे।



In existence, no human being is perfect. Every person has his own unique nature and individual field of expertise. Even those, whom we know as gods were unaware of the knowledge of science all their life.

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