April 25, 2016 9:30 am

आप राजा बनना चाहते हैं कि सेवक पहले यह तय कर लो फिर जीवन को आगे बढ़ाओ सहायता दोनों की सायकोलोजी समझाकर मैं आपकी कर देता हूँ…

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यह संसार तो एकदम सीधा है लेकिन हमारी दिक्कत यह है कि हम इसे उलटा देखने के आदी हो चुके हैं। इसलिए सबकुछ उलटा करते-समझते हैं। संसार को सीधा देखने वाली ना तो हमारे पास आंख है और ना ही उतना उच्च सायकोलोजिकल नॉलेज आसानी से उपलब्ध है। लेकिन जीवन में यह तय जान लो कि यह निर्णय किए बगैर कि आप राजा बनना चाहते हैं या सेवक; आपका जीवन कभी सही दिशा में आगे नहीं बढ़ सकता है। इसके अलावा आप जीवन में चाहे जो क्यों न कर लो, सुख व सफलता का एहसास आपको कभी नहीं हो सकता है।

और इस पूरी बात का सायकोलोजिकल पहलू समझने से पूर्व समझो यह कि आप राजा किसे कहते हैं और सेवक किसे कहते हैं? आप राजा उसको कहते हैं जो बड़ा व्यवसायी, बड़ा नेता, या जिसके पास किसी भी रूप में धन व सत्ता है। और आप सेवक उसे कहते हैं जो इनके निर्देश मानने को बाध्य होता है। लेकिन दरअसल आपकी यह परिभाषा और सोच दोनों गलत है। थोड़ा गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि बड़ा व्यवसायी दरअसल अपने हजार कर्मचारियों का सेवक है। शासक को हर बात व हर छोटी-मोटी घटना के लिए दिन-रात एलर्ट रहना पड़ता है। और ऐसा एक-दो नहीं हर फील्ड में है। कहने का तात्पर्य यह कि जिन्हें आप शासक समझते हैं, थोड़ा-सा गौर करेंगे तो आप पाएंगे कि वे सेवक हैं। और जिन्हें आप सेवक समझते हैं, वे फ्री के फ्री हैं।

…तो कहने का तात्पर्य यह कि पहले तो आप राजा और सेवक की ठीक परिभाषा समझ लें। बुराई दोनों में से किसी में नहीं, सिर्फ पहले आप यह तय कर लें कि आपकी सायकोलोजी को क्या सूट करता है। क्योंकि संसार में जो इतना दुःख है उसका यह एक कारण राजा और सेवक की गलत परिभाषा करना और फिर बिना अपनी सायकोलोजी समझे गलत जगह कूद जाना भी है। और उस कारण हो यह रहा है कि जिसकी सायकोलोजी राजा की तरह जीने की है वह सोचता है कि बड़ा बन जाऊं तो राजा हो जाऊंगा। फिर बड़े बनने पर पता चलता है कि वह तो सेवक हो गया। अपने लिए तो जी ही नहीं पा रहा, अपने लिए समय ही नहीं निकाल पा रहा। दूसरी तरफ बेचारा सेवक बनने निकला भी फंस जाता है। परिणाम में दोनों दुःखी रहते हैं।

सो, आप दुःखों की कब्र खोदने से बचना चाहते हो तो पहले अपनी सायकोलोजी को अच्छे से पहचान लो कि वह राजा की है या सेवक की, और सेवक की हो तो ही राजा बनने की ओर कदम बढ़ाओ। वरना अपने को पहचाने बगैर गलत परिभाषा से जीवन को आगे बढ़ाओगे तो फंस जाओगे। यही सबके साथ हो रहा है, पर आप बच जाओ।

– दीप त्रिवेदी